क्षितिज भाग-1 कक्षा - 9 पाठ -वाख पाठ्य पुस्तक के प्रश्न-अभ्यास पाठ -वाख प्रश्न 1. 'रस्सी' यहाँ किसके लिए प्रयुक्...
क्षितिज भाग-1
कक्षा - 9
पाठ -वाख
पाठ्य पुस्तक के प्रश्न-अभ्यास
पाठ -वाख
प्रश्न 1. 'रस्सी' यहाँ किसके लिए प्रयुक्त हुआ है और वह कैसी है?
उत्तर- 'रस्सी' शब्द जीवन जीने के साधनों के लिए प्रयुक्त हुआ है। वह स्वभाव में कच्ची अर्थात् नश्वर है।
प्रश्न 2. कवयित्री द्वारा मुक्ति के लिए किए जाने वाले प्रयास व्यर्थ क्यों हो रहे हैं?
उत्तर - कवयित्री का जीवन बीता जा रहा है। उम्र बढ़ती जा रही है। मृत्यु निकट आ रही है, किंतु प्रभु से मिलन हो पा रहा। अतः उसे लगता है कि उसकी सारी साधना व्यर्थ हुई जा रही है। साधना का परिणाम नहीं निकल रहा।
प्रश्न 3. कवयित्री का 'घर जाने की चाह' से क्या तात्पर्य है?
उत्तर- परमात्मा से मिलना।
प्रश्न 4. भाव स्पष्ट कीजिए-
(क) जेब टटोली कौड़ी न पाई।
(ख) खा-खाकर कुछ पाएगा नहीं, न खाकर बनेगा अहंकारी।
उत्तर-
(क) कवयित्री को अनुभव होता है कि वह जीवन-भर हठयोग-साधना करती रही, किंतु कोई सफलता न मिल सकी। उसकी जेब खाली ही रही।
(ख) मनुष्य भोग कर-करके अपना शरीर ही नष्ट करता है। उसे कोई उपलब्धि नहीं हो पाती। वह परमात्मा से दूर हो जाता है। भोग करना एक प्रकार का भटकाव है। भोगों पर लात मारने वाला, अर्थात् त्यागी तपस्वी-व्रती महात्मा अहंकारी हो जाता है। वह स्वयं को सबसे ऊंचा मानने लगता है। अतः वह भी ईश्वर भक्ति से भटक जाता है।
प्रश्न 5. बंद द्वार की साँकल खोलने के लिए ललद्यद ने क्या उपाय सुझाया है?
अथवा
ललद्यद के अनुसार, बंद द्वार की साँकल कैसे खुलती है?
उत्तर- ललद्यद ने सुझाव दिया है कि भोग और त्याग के बीच संतुलन बनाए रखो न तो भोगों में लिप्त रहो, न ही शरीर को सुखाओ; बल्कि मध्यम मार्ग अपनाओ। तभी प्रभु मिलन का द्वार खुलेगा।
प्रश्न 6. ईश्वर प्राप्ति के लिए बहुत से साधक हठयोग जैसी कठिन साधना भी करते हैं, लेकिन उससे भी लक्ष्य प्राप्ति नहीं होती। यह भाव किन पंक्तियों में व्यक्त हुआ है?
उत्तर- उपर्युक्त भाव निम्न पंक्तियों में प्रकट हुआ है-
आई सीधी राह से गई न सीधी राह ।
सुषुम सेतु पर खड़ी थी. बीत गया दिन आह!
जेब टटोली, कौड़ी न पाई।
माझी को दूँ, क्या उतराई ?
प्रश्न 7. 'ज्ञानी' से कवयित्री का क्या अभिप्राय है?
उत्तर-'ज्ञानी' से कवयित्री का अभिप्राय है जिसने परमात्मा को जाना हो, आत्मा को जाना हो।
अन्य महत्त्वपूर्ण परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर:--
प्रश्न 1. 'वाख' का अर्थ क्या है? इस कविता में 'रस्सी' किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?
उत्तर- 'वाख' अनुभव के आधार पर लिखी गई कविता को कहते हैं। यहाँ 'रस्सी' जीवन जीने के साधनों को और 'नश्वर आयु' को कहा गया है।
प्रश्न 2. कवयित्री ललद्यद किस रस्सी से कौन-सी नाव खींचना चाहती है?
उत्तर- वह कच्चे धागे की रस्सी से जीवन रूपी नाव खींचना चाहती है। आशय यह है कि वह नश्वर साँसों के बल पर जीवन का निर्वाह कर रही है।
प्रश्न 3. कवयित्री ने परमात्मा-प्राप्ति का क्या उपाय बताया है?
उत्तर - कवयित्री के अनुसार, परमात्मा-प्राप्ति के लिए दिल में 'हूक' उठना आवश्यक है। दूसरे, जीवन में त्याग और भोग के बीच सहज जीवन जीना आवश्यक है। न भोग में आसक्ति, न त्याग का आग्रह और न हठयोग। इनसे कुछ हाथ नहीं आता। परमात्मा को जानने के लिए आवश्यक है कि मनुष्य पहले मन को टटोले, अपने आप को जाने, आत्मज्ञान प्राप्त करें।
प्रश्न 4. कवयित्री ललद्यद का दिन यूँ ही किस प्रकार बीत गया?
उत्तर- कवयित्री ललद्यद का दिन व्यर्थ की साधनाओं में भटक गया। उन्हें उनसे कुछ नहीं मिला। अतः उन्हें लगा किउनका दिन व्यर्थ ही बीत गया।
प्रश्न 5. कवयित्री द्वारा मुक्ति के लिए कौन-कौन से प्रयास किए जा रहे हैं जो व्यर्थ हो रहे हैं? ललद्यद ने परमात्मा प्राप्ति का क्या उपाय बताया है?
उत्तर- कवयित्री द्वारा मुक्ति के लिए हठयोग-साधना करने का प्रयास किया जा रहा था जो कि व्यर्थ हो गया। उन्होंन बताया है कि परमात्मा को पाने का सच्चा उपाय यह है कि त्याग और भोग के बीच संतुलन बैठाया जाए और मन में परमात्मा को पाने की हूक उठे।
प्रश्न 6. कवयित्री के मन में क्या हूक उठती है?
उत्तर - कवयित्री के मन में प्रभु-मिलन की हूक उठती है।
प्रश्न 7. वाख के अनुसार, मनुष्य समभावी कब बनेगा ?
उत्तर- मनुष्य भोग और त्याग के बीच संतुलन बनाने से ही समभावी बन सकेगा।
प्रश्न 8. ललद्यद के अनुसार 'माझी' और 'उतराई' शब्दों के अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- 'माझी' का अर्थ है-नाव पार लगाने वाला अर्थात भगवान ।
'उतराई' का अर्थ है-भेंट चढ़ावा, समर्पण।
प्रश्न 9 कवयित्री ललद्यद ने माझी को कौन-सी उतराई देने की बात कही है?
उत्तर- कवयित्री ने माझी अर्थात सद्गुरु को उतराई के रूप में अपनी भक्ति समर्पित करने की बात कही है।
प्रश्न 10. माझी किसके लिए प्रयुक्त हुआ है और क्यों?
उत्तर- माझी ईश्वर के लिए प्रयुक्त हुआ है।
क्योंकि ईश्वर ही मनुष्य को इस संसार की कठिनाइयों से बचाकर अपनी शरण में लेता है।
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